लंबी टोपी,बदशक्ल सी दिखने वाली दाढ़ी और लाॅम काॅफ वाली बोली बोलने वाला शख़्स रोज़ाना टीवी चैनलों पर तीस करोड़ मुस्लमानो का प्रतिनिधित्व करता हुआ आपको दिख जाएगा, जो जामिया या शाहीन बाग की किसी गलियों से आता है। जहां खुद की उसकी कोई पहचान नही, मुस्लमान का एक बच्चा भी उसको सलाम करना लाजिम नही समझता है, वो अपने आप को मौलाना कहता है हालांकि वो अनपढ़ और मूर्ख है उसका धर्म पैसा है,
जब वो टोपी लगाए डिबेट में आता है तो देश उसे मौलाना और उसकी अज्ञानता और मूर्खता को इस्लाम का पैगाम समझती है।
वो अर्णव से गाली भी सुनता है,अमरिश से डांट भी खाता है और अंजना से बेशर्म की तरह माफी भी मांगता है हालाँकि इसके लिए अलग से उसे इंसेंटिव भी मिलता होगा।
ये ठगस आॅफ मुस्लमान कभी राजनैतिक विश्लेषक(जिसने राजनीति विज्ञान की परिभाषा भी जीवन मे कभी नही पढ़ी होगी) कभी मुस्लिम स्काॅलर(जिसके पास इस्लाम की बुनियादी तालिम भी नही होगी) तो कभी समाज सुधारक(जिसे समाज के अन्दर अच्छे और बुरे का फर्क भी नहीं मालूम होगा) बनकर चैनलों पर अपनी अज्ञानता, अशिक्षा और अनपढ़ता से हास्य का पात्र बनता है तथा इस्लाम और मुस्लमान का ग़लत चित्र भी प्रस्तुत करता है।
इस देश में क़ाबिल पढ़े-लिखे मुसलमान मौजूद है, इनमे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, रिटायर ब्यूरोक्रेट आईएएस आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी प्रोफेशनल्स, बिजनेसपर्सन, बड़े पॉलीटिशियन, फिल्म स्टार,स्पोर्टस स्टार, वैज्ञानिक लेकिन टीवी खोलने पर आपको सिर्फ ठग्स आॅफ मुस्लमान ही दिखेंगे।
ठग्स आॅफ मुस्लमान न्यूज़ चैनल को कोसते हैं। लेकिन पूरे दिन चैनल पर बैठे रहते हैं। सोशल मीडिया पर टीवी चैनल या एंकरों पर लिबरल लोग खूब बोलेंगे। लेकिन सूरमा लगाकर पूरे दिन नफरत और जाहिलियत के डिबेट को पेट्रोल देने वाले ठग्स आॅफ मुस्लमान पर सवाल नहीं उठाएंगे।